Olea europaea (जैतून)
Kew के हर्बेरियम में जैतून की मुड़ी हुई पत्तियों की एक माला शामिल है, जिसे सम्राट तुतनखामन के पत्थर निर्मित ताबूत में पाया गया था, और जो 3,300 वर्ष पुरानी है।
प्रजाति संबंधी जानकारी
- वैज्ञानिक नाम: Olea europaea L.
- प्रचलित नाम: जैतून
- संरक्षण स्थिति: IUCN द्वारा इसके संबंध में काफी कम चिंता (LC) आंकी गई है।
- प्राकृतिक वास: मौसमी तौर पर शुष्क हो जाने वाले भूमध्यसागरीय आवास, या उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में झाड़-झंखाड़ वाले स्थानों पर पाई जाने वाली वनस्पति।
- ज्ञात खतरे: किसी के बारे में जानकारी नहीं।
वर्गीकरण
- वर्ग: इक्विसेटोप्सिडा
- उप-वर्ग: मैग्नोलिडा
- उपगण: एस्टेरैना
- गण: लैमिएल्स
- परिवार: ओलिएसी
- वंश: Olea
इस प्रजाति के बारे में
जैतून के वृक्ष (Olea europaea) काफी समय से धन, प्राचुर्य, शक्ति और शांति के प्रतीक माने जाते हैं। जैतून स्मरणातीत काल से ही भूमध्यसागरीय क्षेत्र का प्रतीक रहा है, और लंबे जीवन, पोषण और कठिन परिस्थितियों में पनपने के लिए विख्यात रहा है। इसका प्राथमिक उत्पाद, जैतून का तेल वानस्पतिक तेलों का रोल्स रॉयस है, और अपनी विशिष्ट प्रकार की सुगंध के लिए विश्व भर में सम्मानित रहा है। होमर ने इसे ‘तरल सोना’ कहा था। प्राचीन यूनान में खिलाड़ी अपने शरीर पर जैतून का तेल मलते थे, और विजयी प्रतियोगिताओं को कोई ट्रॉफी या तमगा नहीं मिलता था, बल्कि सर्वोच्च सम्मान का प्रतीक जैतून की माला थी, जिसे उसके सिरों पर पहनाया जाता था। और यह काफी लंबे समय तक जीवित रहता है - इस तरह के दावे भी किए गए हैं कि 1,600 साल पुराने वृक्ष अब भी फल उत्पादित कर रहे हैं।
भौगोलिकता एवं वितरण
यह प्रजाति भूमध्यसागरीय क्षेत्र, अफ्रीका और एशिया में व्यापक स्तर पर प्रसारित है।
विवरण
अधिक जानकारीOlea europaea के फल (चित्र: वुल्फगैंग स्टूपी)
Olea europaea एक सदाबहार झाड़ी या वृक्ष है, जो 15 मीटर की ऊँचाई तक बढ़ता है। यह धीमी गति से परिपक्वता हासिल करता है, लेकिन सैंकड़ों वर्षों तक जीवित रह सकता है। पत्तियाँ एक-दूसरे के विपरीत दिशा में स्थित जोड़ों में उगती हैं। वे सदाबहार होती हैं और 3 से 9 सेमी तक लंबी, दीर्घवृत्ताकार, रूपहली दिखती हैं। पुष्प चार खंडीय बाह्यदलपुंज और चार खंडीय दलपुंज वाले होते हैं और कक्षवर्ती गुच्छों के रूप में उगते हैं। दो पुंकेसर (नरअंग) पुष्प के मुँह के बाहर की ओर निकले हुए होते हैं। फल में एक कठोर अंतःभित्ति (ओलाइव स्टोन) होती है जो एक गूदेदार खाद्य मध्यभित्ति से घिरी होती है।
हाल ही में आनुवंशिक दृष्टि से पृथक छह उपप्रजातियों की पहचान की गई है। उपप्रजाति europaea भूमध्यसागर के इर्दगिर्द बोए गए जैतून (प्रकार europaea) और अपने वन्य संबंधी (प्रकार sylvestris), दोनों रूपों में पाई जाती है। उपप्रजाति cerasiformis केवल मैडेइरा द्वीप तक सीमित है जबकि उपप्रजाति guanchica केवल कैनरी द्वीप पर पाई जाती है। उपप्रजाति maroccana थोड़ी संख्या में मोरक्को के हाई एटलस माउंटेन के दक्षिणी किनारे पर पाई जाती है। हॉगर, एयर और जेबेल मारा की अलग-थलग पर्वतश्रेणी पर भी एक अलग ढंग की उपप्रजाति, laperrinei पाई जाती है। शेष बची उप प्रजाति cuspidate पूर्वी औऱ दक्षिणी अफ्रीका, अरब एवं एशिया में दक्षिणी चीन तक व्यापक स्तर पर पाई जाती है।
वैसे जैतून की 1,000 से अधिक ऐसी चयनित प्रजातियाँ हैं जिनके फल (गुठलीदार फल) पूरे भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उगने वाले अपने जंगली पूर्वजों की तुलना में अधिक बड़े और अधिक गूदेदार होते हैं।
प्रयोग
अधिक जानकारीलगभग 5,000 वर्षों से भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उगाए जाने वाले जैतून वृक्ष ने इस क्षेत्र की प्राकृतिक दृश्यावली और संस्कृति को आकार दिया है: 90% जैतून वृक्ष भूमध्यसागरीय क्षेत्र में उगाए जाते हैं। यह क्षेत्र की सर्वाधिक बहुउपयोगी और मूल्यवान फसल होती है, इसके फल, तेल और पत्तियों का प्रयोग, भोजन, ईंधन, औषधि और शव लेपन कार्यों के लिए किया जाता है।
जैतून की पत्तियों की खेती का इतिहास समय की धुंध से लिपटा हुआ है, इजरायल के पुरातात्विक स्थलों से ओलाइव स्टोंस की खोज दर्शाती है कि इसका प्रयोग कम से कम 20,000 सालों से किया जा रहा है; 5,000 साल पहले जैतून की खेती शुरू की गई और पूरे लेवांट में इसका प्रसार हो गया। इसका घरेलूकरण संभवतः पूर्वी भूमध्यसागरीय क्षेत्र या नील के डेल्टा में हुआ था, जहाँ उस समय की जलवायु इसकी खेती के लिए अधिक उपयुक्त थी। माना जाता है कि इस समय विश्व में जैतून के लगभग 1,000 मिलियन (दस अरब) वृक्ष हैं।
Olea europaea (चित्र: पीटर गैसन)
जैतून की कटाई शरद् ऋतु में की जाती है। यदि उन्हें मेज़ पर परोसा जाना है तो उन्हें पाँच दिनों तक पानी में भिगोया जाता है ताकि उनमें से ओलेयूरोपेइन जैसे कसैले फिनॉलिक यौगिक निकल जाएँ। उसके बाद उन्हें लगभग चार सप्ताह तक नमक के घोल में उपचारित किया जाता है। जैतून के हरे फल कच्चे होते हैं, जबकि काले फल पके होते हैं एवं कम कसैले होते हैं। जैतून के फल अनेक प्रकार की चीजों के साथ खाए जाते हैं और वे भूमध्यसागरीय क्षेत्र में पकाए जाने वाले खाद्य पदार्थों के एक महत्त्वपूर्ण घटक हैं।
जैतून का तेल उसके फल से प्राप्त किया जाता है। कटाई के फौरन बाद, फलों की सफाई की जाती है और उन्हें एक प्रकार की लेई के रूप में संसाधित किया जाता है जिससे तेल निष्कर्षित किया जाता है। जैतून के तेल को उसके उत्पादन की विधि एवं ओलेइक अम्ल अंतर्वस्तु के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। शुद्ध या ठंड-दाब (कोल्ड प्रेस्ड) वाले जैतून के तेल को केवल दबा कर प्राप्त किया जाता है एवं उसमें 2% तक ओलेइक अम्ल मौजूद रहता है; जैतून के परिष्कृत तेल को ताप या विलायकों के माध्यम से कर्षित किया जाता है एवं खाद्य तेल प्राप्त करने के लिए उसे और संसाधित किए जाने की आवश्यकता होती है; उसमें लगभग 3.3% ओलेइक अम्ल पाया जाता है। बचे हुए केक (खली) का उपयोग औद्योगिक स्तर के अखाद्य तेल के स्रोत के रूप में किया जाता है (उसमें 3.3% से अधिक ओलेइक अम्ल होता है), और उसका प्रयोग पशुओं के भोजन एवं कंपोस्ट के रूप में भी किया जाता है।
जैतून के तेल का प्रयोग खाद्य पदार्थ, भोजन पकाने एवं अनके प्रकार के चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए किया जाता है। वयस्कों के लिए जैतून के तेल की सुरक्षित खुराक दो बड़े चम्मच (28 ग्रा) प्रतिदिन है। प्रमाण संकेत देते हैं कि जिन लोगों के भोजन में जैतून का तेल शामिल होता है उनके लिए स्तन एवं कोलोरेक्टल कैंसरों के विकसित होने का खतरा कम होता है। इसी तरह जैतून के तेल से युक्त खुराक (और संतृप्त वसा के निम्न स्तर) का संबंध हृदय-वाहिकाओं की बीमारियों, कोलेस्ट्रॉल के उच्च स्तर और उच्च रक्त दाब के खतरे में कमी से है।
जैतून के तेल के लाभदायक गुणों का संबंध इसकी वसीय अम्ल संरचना और फिनॉलिक यौगिकों की उपस्थिति से जोड़ा जाता है, जो ऑक्सीकरण प्रतिरोधी, वाहिनी विस्फारक, प्लेटलेट-प्रतिरोधी और सूजन-प्रतिरोधी प्रभाव डालने वाले प्रतीत होते हैं। Kew इस संबंध में शोध कर रहा है कि जैतून के तेल के उत्पादन के दौरान प्राप्त उच्छिष्ट उत्पादों का उपयोग हृदय-वाहिकाओं की बीमारियों का उपचार करने के लिए औषधियों के निर्माण हेतु स्रोतों के रूप में किस प्रकार किया जा सकता है।
अपनी उत्कृष्ट बनावट और जटिल संरचना के कारण जैतून की लकड़ी का प्रयोग खराद और फर्नीचर बनाने के लिए किया जाता है, यद्यपि उसके घनत्व के कारण उस पर कार्य करना काफी कठिन होता है (यह काफी कठोर और भारी होती है)। जैतून की लकड़ी और जैतून की फलों की गुठली ईंधन के लिए उत्कृष्ट सामग्री है।
खेती
दक्षिण फ्रांस में पौंत दे गार्द में जैतून वृक्षों की एक कतार (चित्रः पीटर गैसन)
जैतून के नए पौधों को वृक्ष समूह की नर्सरी के बीजों से उगाया जाता है। इनका अंकुरण अनियमित ढंग का पाया गया है, जिसमें कुछ सप्ताह से लेकर कुछ महीने तक लग सकते हैं। अंकुरण माध्यम के रूप में उपयोग में लाई जाने वाली कंपोस्ट खुली, रोड़ीदार और मुक्त-निकासी वाली मिश्रण होती है।
पौदों को ‘एयर पॉट्स’ में स्थापित कर दिया जाता है। ‘एयर पॉट्स’ पौधों की जड़ों को सर्पिल ढंग के बजाय बाहर की ओर वृद्धि करने के लिए प्रोत्साहित करके उन्हें पात्र की सीमा में आबद्ध नहीं होने देते। उन्हें एयर पॉट्स से सीधे बगीचे में वांछित स्थिति में रोपा जा सकता है। पौदों को जिस ग्लास हाउस क्षेत्र में उगाया जाता है, उसे कम से कम 5˚ सेंटीग्रेट पर रखा जाता है। उन्हें केवल प्राकृतिक प्रकाश उपलब्ध कराया जाता है। नए पौधों को पर्याप्त पानी दिया जाता है और उन्हें सूखने नहीं दिया जाता है।
भूमध्यसागरीय बगीचों में उगने वाले कई वृक्ष 100 वर्ष पुराने हैं, ये प्रत्यारोपण के दौरान भी जीवित रहे, जबकि वे परिपक्व थे और उन पर इस प्रक्रिया का प्रभाव तत्काल पड़ सकता था। इन वृक्षों को उत्तरी इटली की एक नर्सरी से प्राप्त किया गया था, जिसने उन्हें उन भूस्वामियों से प्राप्त किया ता, जो उन्हें हटाना या प्रतिस्थापित करना चाहते थे, और इस प्रकार उसने इन वृक्षों के अपेक्षाकृत अधिक लंबे जीवन को सुनिश्चित किया।
Kew में जैतून
Kew के हर्बेरियम में रखे गए Olea europaea के नमूने (चित्र: RBG Kew)
Kew के हर्बेरियम के 70 लाख से भी अधिक नमूनों में सर्वाधिक पुरानी है जैतून की मुड़ी हुई पत्तियों की एक माला जिसे सम्राट तुतनखामन के पत्थर के ताबूत से हासिल किया गया था। जैतून की पत्तियों की यह भलीभाँति संरक्षित माला 3,300 वर्ष पुरानी है। हर्बेरियम Kew का गतिविधियों के नेपथ्य में स्थित एक क्षेत्र है जहाँ पहले से समय से तय किए जाने पर नमूने सच्चे शोधकर्ताओं के लिए उपलब्ध हैं।
सन् 2006 की ग्रीष्म ऋतु में नई प्राकृतिक दृश्यावलियों की एक भूमध्यसागरीय सेटिंग (Mediterranean setting) में अनेक परिपक्व वृक्ष रोपे गए। इनमें कॉर्क ओक (शाहबलूत) (Quercus suber) स्टोन पाइन (चीड़) (Pinus pinea) और एक जैतून वृक्ष (Olea europaea) के नमूने शामिल थे। टोनी हाल, जिन्होंने इस संग्रह को प्रबंधित किया, ने पाया कि जैतून वृक्ष बलुआ, जल के मुक्त बहाव वाली मिट्टी के प्रति अच्छी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। सन् 2008 की सर्दियों में वे बर्फ, पाला और 7 ˚सेंटीग्रेट से भी नीचे के तापमान पर जीवित रहे। अब तक पुष्पों और छोटे फलों को देखा जा चुका है, पर Kew में अब तक पके हुए फल नहीं देखे गए हैं।
Temperate House (टेम्परेट हाऊस) समशीतोष्ण कक्ष में Olea europaea का एक अत्यंत उत्कृष्ट नमूना है जो 150 वर्ष से अधिक पुराना है।
संदर्भ और श्रेय
Kew विज्ञान संपादक: डेविड गायडर
Kew योगदानकर्ता: टोनी हॉल (HPE), ओल्वेन ग्रेस (Sustainable Uses Group)
कॉपी संपादन: एम्मा ट्रेडवेल