Ginkgo biloba (मेडेनहेयर वृक्ष)
Ginkgo biloba, या मेडेन हेयर ट्री, को ‘जीवित जीवाष्म’ के रूप में वर्णित किया जाता है, क्योंकि यह वृक्षों के एक ऐसे समूह का एक मात्र जीवित प्रतिनिधि है, जो डायनासॉर्स से भी अधिक पुराना है।
प्रजाति संबंधी जानकारी
- वैज्ञानिक नाम: Ginkgo biloba
- प्रचलित नाम: मेडेनहेयर वृक्ष
- संरक्षण स्थिति: IUCN Red List 2002 पर संकटग्रस्त के रूप में वर्गीकृत (EN - B1+2c)।
- प्राकृतिक वास: मेडेनहेयर वृक्ष के लिए सूर्य के पूर्ण प्रकाश के संपर्क में आने वाली नमीयुक्त गहरी, बलुआ जमीन सर्वाधिक उपयुक्त है लेकिन इसमें विविध प्रकार की तनावपूर्ण परिस्थितियों के साथ अनुकूलन करने की अत्यधिक क्षमता है। हिरोशिमा पर सन् 1945 में परमाणु बम गिराए जाने के बाद उसके समीप उगने वाला यह पहला वृक्ष था। Anraku-ji स्थित एक वृक्ष के तने के काफी ऊपर के हिस्से पर उस विस्फोट से झुलसने के निशान अब भी मौजूद हैं।
- मुख्य प्रयोग: सजावटी कार्यों में। औषधि के रूप में।
- ज्ञात खतरे: गिंकगोटॉक्सिन (4'-O-मेथिलपाइरिडॉक्साइन), इसके बीजों का अवयव होता है, जो बीजों को अच्छी तरह न पकाए जाने की स्थिति में विषैला सिद्ध हो सकता है।
वर्गीकरण
- वर्ग: गिंकगूप्सिडा
- उप-वर्ग: गिंकगूइडा
- गण: गिंकगोल्स
- परिवार: गिंकगोएसी
- वंश: Ginkgo
इस प्रजाति के बारे में
यह उल्लेखनीय वृक्ष ‘जीवित जीवाष्म’ के रूप में जाना जाता है, क्योंकि यह वृक्षों के एक ऐसे प्राचीन समूह का एकमात्र जीवित प्रतिनिधि है जो डायनासॉर्स के समय से भी अधिक पुराना है। Ginkgo जीवाष्म जुरासिक और क्रीटैसिअस की चट्टानों में आम तौर पर पाए जाते हैं, लेकिन आज कल Ginkgo वृक्ष अपने वंश का एकमात्र सदस्य है, और यह वंश अपने कुल का एकमात्र वंश है, और कुल अपने गण का एक मात्र कुल है, और यह गण अपने वर्ग का एकमात्र गण है। मेडेनहेयर वृक्ष वास्तव में आज तक अपरिवर्तित दशा में है और ‘उच्च’ और ‘निम्न’ स्तर के पौधों (फर्न्स और कॉनिफर्स के बीच) के बीच का एकमात्र जीवित सेतु है।
भौगोलिकता एवं वितरण
Ginkgo biloba चीन का मूल निवासी है, जहाँ जंगली पौधों का जीवन सुरक्षित नहीं है। इसके नमूने झेजियांग प्रांत के झितिआनम पर्वत पर पाए जा सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या ये सही मायने में अंतिम तौर पर पाए जाने वाले जंगली वृक्ष हैं या मंदिरों के बगीचों में उगाए जाने वाले वृक्षों के वंशज हैं। आकर्षक मेडेनहेयर वृक्ष सजावटी वृक्षों के तौर पर व्यापक स्तर पर रोपे जाते हैं, और उगाए गए एकल वृक्ष पूरे विश्व में मौजूद हैं। ये वृक्ष पारंपरिक तौर पर जापान और चीन के मंदिरों के बगीचों में उगाए जाते थे, लेकिन आजकल ये पूरे विश्व के शहरों में लोकप्रिय हैं और इनके औषधीय गुणों के कारण बागानों तक में इनकी खेती की जाती है।
विवरण
अधिक जानकारीये वृक्ष 40 मीटर तक की ऊँचाई तक बढ़ सकते हैं और पुराने एकल वृक्ष अपनी अनियमित ढंग की शाखाओं सहित और विस्तृत स्वरूप धारण करने की प्रवृत्ति रखते हैं। पुराने एकल वृक्षों की गहरी दरारों से युक्त भूरी छाल कार्क जैसी दिख सकती है। नर और मादा वृक्ष अलग-अलग होते हैं, नर पराग पत्तियों के बीच मंजरी सरीखे शंकुओं में जनित होते हैं जबकि मादा बीजांड और अधिक गोलाई लिए होते हैं। निषेचन के बाद पीले रंग के बीज बाहरी गुदेदार छिलके के साथ विकसित होते हैं, जो आलू बुखारा जैसा दिखते हैं।
लाक्षणिक विशेषता वाली हरापनयुक्त पीली पत्तियाँ पंखों के आकार की होती हैं और दो या दो से अधिक पृथक-पृथक लोब्स (पालियों) से निर्मित होती हैं। प्रजाति का लैटिन नाम biloba इस तथ्य को अभिव्यक्त करता है। मेडेनहेयर वृक्ष के सामान्य तौर पर प्रचलित नाम का संबंध मेडेनहेयर फर्न्स (Adiantum प्रजातियाँ) के साथ इसकी पत्तियों की समानता से है। Ginkgo वृक्ष की पत्तियाँ पतझड़ (शरद् ऋतु) के मौसम में जमीन पर गिरने से पहले एक सुंदर सुनहरी रंगत धारण कर लेती हैं।
मेडेनहेयर वृक्ष को परिपक्वता हासिल करने और बीजधारण प्रारंभ करने में 20-35 वर्ष लगते हैं। परागकण और बीजांड वसंत ऋतु में अलग-अलग वृक्षों पर उत्पन्न होते हैं, और निषेचन के बाद, गोलाकार बीज एक गूदेदार बाहरी आवरण के साथ विकसित होते हैं। पतझड़ के मौसम (शरद् ऋतु) में ये जमीन पर गिर जाते हैं और जब बीज के आवरण का क्षय होता है तो वह बासी मक्खन जैसी महक फैलाता है। मेडेनहेयर वृक्ष की आयु काफी लंबी हो सकती है, रिकॉर्ड किए गए सबसे पुराने एकल वृक्ष की आयु 3,500 वर्ष है।
संकट और संरक्षण
यह मनमोहक प्रजाति पूरब के मंदिरों के बगीचों में उगी और यूरोप में इसके बीज पहली बार 17वीं सदी में लाए गए। जंगलों में Ginkgo के ह्रास का कारण (यह केवल चीन का मूल निवासी है) संभवतः जंगलों की कटाई है।
यह निश्चित नहीं है कि क्या मेडेनहेयर वृक्ष जंगलों में अब भी बरकरार है, और फिलहाल इसके संरक्षण की कोई परियोजना कार्यान्वित नहीं की जा रही है। लेकिन इसके उगाए गए वृक्ष पूरे विश्व में पाए जाते हैं, और इसके औषधीय गुणों से करोड़ों डालर के उद्योग ने लाभ उठाया है। नतीजे के तौर पर, यह संभव है कि यह प्राचीन वृक्ष समय द्वारा ली जाने वाली परीक्षा के दौरान डटा रहेगा।
Kew में किया जा रहा संरक्षण आकलन
Ginkgo biloba नमूनाकृत लाल सूची निर्देशिका परियोजना के अंग के तौर पर परीक्षणाधीन है, जिसका उद्देश्य विश्व की पौध प्रजातियों के एक प्रतिनिधि नमूने का संरक्षण आकलन प्रस्तुत करना है। उसके बाद उस सूचना का उपयोग अस्तित्व लोपन के खतरों से संबंधित प्रवृत्तियों के निरीक्षण और संरक्षण संबंधी प्रयासों को उन बिंदुओं पर केंद्रित करने में सहायता देने के लिए किया जाएगा जहाँ उनकी सबसे अधिक आवश्यकता है।
प्रयोग
अधिक जानकारीएशिया में Ginkgo biloba के सांस्कृतिक महत्त्व का लंबा इतिहास है। कहा जाता है कि कनफ्यूशियस ने अपनी शिक्षाएँ एक गिंकगो वृक्ष के नीचे बैठ कर दी थीं, जो चीनी परंपरा में इस प्रजाति को श्रद्धेय माने जाने का एक कारण यह भी है।
इसे एक सजावटी या बोंसाई (छोटे पात्रों में उगाए जाने वाले शोभाकारी वृक्ष) वृक्ष, या छाया देने वाले वृक्ष के तौर पर रोपा जाता है। नर वृक्षों को वरीयता दी जाती है क्योंकि मादा वृक्षों के गूदेदार शंकुओं से अप्रिय गंध उत्पन्न होती है। महक के बावजूद ये स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ हैं, इसीलिए चीनी भाषा में इन्हें ‘सिल्वर एप्रिकॉट’ (रजत खूबानी) कहते हैं।
ये बीज, जिन्हें गिंक्गो नट (काष्ठफल) के नाम से जाना जाता है, उन्हें भून कर या बर्ड्स नेस्ट सूप में खाया जाता है। कहा जाता है कि पकाए जाने पर इसका स्वाद चीड़ के काष्ठफल और स्वीट चेस्टनट (अखरोट की जाति के एक वृक्ष का फल) जैसा होता है। बीजों को यदि ठीक से न पकाया जाए तो उनका एक घटक, गिंकगोटॉक्सिन (Ginkgotoxin) (4'-O-मेथिलप्राइरिडोक्साइन) जहरीला साबित हो सकता है।
गिंक्गो को चीन की पारंपरिक औषधियों में सैंकड़ों वर्षों से प्रयुक्त किया जाता रहा है। आजकल इसे पश्चिमी औषधियों में प्रयुक्त करने के लिए भी उगाया जाता है। इसकी पत्तियों का उपयोग ज्ञान-संबंधी बीमारियों, जैसे अल्ज़ीमर्स रोग, विक्षिप्तता (dementia) और वर्टिगो के उपचार के लिए जड़ी-बूटियों से बनाई जाने वाली औषधियों में किया जाता है। Ginkgo biloba की प्रकाश रासायनिकता और जैव गतिविधियाँ व्यापक शोध का विषय रही हैं।
खेती
अधिक जानकारीGinkgo biloba के फल (चित्र: Wolfgang Stuppy)
खेती के लिए नर वृक्षों को वरीयता दी जाती है, क्योंकि मादा वृक्षों पर तेज महक वाले फल लगते हैं जो कुछ लोगों को अरुचिकर लगते हैं। ये फल गूदेदार और पीले रंग के होते हैं, जिनमें एक बड़ा बीज होता है। पौधों के उत्पादन एवं कलम लगाने हेतु प्रकंद के लिए Kew में शरत् ऋतु के दौरान बीजों को संगृहीत किया जाता है। बीजों को गूदा हटाकर और फिर स्तरीकरण के लिए एक शीतागार में रखकर तैयार किया जाता है।
बीजों को वसंत के मौसम में खुली हुई दानेदार कंपोस्ट में बोया जाता है। Kew में इस प्रबंधन का संग्रह करने वाले टोनी हॉल रिपोर्ट करते हैं कि अंकुरण में सामान्यतः आठ से दस सप्ताह लगते हैं और उसके बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है क्योंकि सभी बीजों की क्रियाविधि एक जैसी होती है। अंकुरण की क्रिया एक ठंडे ग्रीन हाउस में होती है जिसे प्राकृतिक प्रकाश में और पालामुक्त (कम से 5° सेंटीग्रेट तापमान पर) रखा जाता है। पौदें सामान्यतः नाशक कीटों और रोगों से मुक्त होती हैं। जब वे पर्याप्त रूप में बड़ी हो जाती हैं तो उन्हें वृक्ष समूह की नर्सरी में रोप दिया जाता है। ऐसा सामान्यतः अगली वसंत ऋतु में किया जाता है। दो साल के बाद पौधे 1.5 मीटर तक बड़े हो सकते हैं और उस समय उन्हें बगीचे में उनके अंतिम स्थान पर रोप दिया जाता है।
Kew में मेडेनहेयर वृक्ष
Waterlily Pond और Bamboo Garden के आसपास के इलाकों में Ginkgo biloba के चयनित रूप से उगाए गए वृक्षों का अच्छा संग्रह मौजूद है। Orangery के निकट Arboretum Nursery में उगाई गई एक पौद को सन् 2009 में महारानी ने Kew की 250वीं वर्षगाँठ के समारोहों के अवसर पर रोपा था। संभवतः इस प्रजाति का सर्वाधिक ज्ञात वृक्ष Princess of Wales Conservatory के पश्चिम में स्थित ‘Old Lion’ है (चित्र देखें, दाएँ)। यह ब्रिटेन में इस प्रजाति के सबसे पहले रोपे गए वृक्षों में से एक है। इसके पुरानेपन का इतिहास कम से कम सन् 1762 तक तो जाता ही है, इसे जब रोपा गया था, उस समय इसकी कठोरता के बारे में जानकारी नहीं थी।
संदर्भ व श्रेय
Kew विज्ञान संपादक: Monique Simmonds