Ficus benghalensis (बरगद)
बरगद एक प्रकार का जकड़ीला वृक्ष होता है, जो भारत और पाकिस्तान का मूल निवासी है। हिन्दू पौराणिकता के अनुसार, यह ‘इच्छाओं को पूरा करने वाला वृक्ष है’, बरगद शाश्वपत जीवन का प्रतीक है।
प्रजाति संबंधी जानकारी
- वैज्ञानिक नाम: Ficus benghalensis
- प्रचलित नाम: बरगद
- संरक्षण स्थिति: अस्तित्व पर संकट नहीं।
- प्राकृतिक वास: उष्ण कटिबंधीय वन, लेकिन उष्ण कटिबंध में अन्य स्थानों पर भी बहुधा उगाया जाता है।
- ज्ञात खतरे: Ficus की विभिन्न प्रजातियों का वानस्पतिक दुग्ध त्वचा की अलर्जिक प्रतिक्रियाओं को जन्म दे सकता है और आँख से इसके संपर्क से बचना चाहिए।
वर्गीकरण
- वर्ग: इक्विसेटोप्सिडा
- उप-वर्ग: मैग्नोलिडा
- उपगण: रोजेना
- गण: यूर्टिकेल्स
- परिवार: मोरैसीई
- वंश: Ficus
इस प्रजाति के बारे में
भारत और पाकिस्तान का मूल निवासी बरगद एक प्रकार का जकड़ीला वृक्ष है। यह पौधा अपना जीवन अन्य वृक्षों पर उगने के साथ प्रारंभ करता है और अंततः उन्हें अपने अंदर पूरी तरह समा लेता है। वायवीय जड़ें शाखाओं से लटकती हैं और अंततः तनों का रूप धारण कर लेती हैं। पुराने वृक्ष अत्यंत विशाल आकार धारण कर सकते हैं – उनका व्यास 200 मीटर और ऊँचाई 30 मीटर तक हो सकती है। उनकी स्वागत करती हुई छाया उन्हें लोगों के जमावड़े का महत्त्वपूर्ण स्थान बना देती है। हिन्दू पौराणिकता में ‘इच्छाओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष’ के रूप में जाना जाने वाला बरगद शाश्वंत जीवन का प्रतीक है। इस वृक्ष को भारत के हिंदू और बौद्ध पवित्र मानते हैं और उन्हें मंदिरों के आस-पास बहुधा रोपा जाता है। अलंकरण योग्य भव्य वृक्ष होने के नाते उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में इसे पार्कों और गलियों के किनारों पर भी रोपा जाता है। शीतोष्ण जलवायु में इसे घरेलू वृक्ष (हाऊस प्लांट) के रूप में उगाया जाता है।
बरगद रंजक (रंग द्रव्य) और चपड़ा बनाने का एक स्रोत है – जो फ्रेंच पॉलिश का एक महत्त्वपूर्ण अवयव है – जिसे लाख निर्मित करने वाले कीड़ों द्वारा निर्मित किया जाता है जो इस वृक्ष पर नाशक कीटों के रूप में निवास करते हैं।
भौगोलिकता एवं वितरण
एशिया (भारत और पाकिस्तान), पूरे उपमहाद्वीप के उष्ण कटिबंधीय वनों में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है।
विवरण
Ficus benghalensis, कागज पर वाटर कलर, एक अज्ञात भारतीय कलाकार द्वारा, 19वीं सदी के प्रारंभ में विलियम रॉक्सबर्ग, कलकत्ता, भारत द्वारा जारी कराया गया
यह वृक्ष, बहुधा, अत्यंत विशाल होता है, जिसकी ऊँचाई 30 मीटर तक हो सकती है, इसकी अनेक वायवीय शाखाएँ होती हैं जो नए तनों के रूप में विकसित हो सकती हैं जिनकी वजह से इस वृक्ष का अनंत विस्तार होता जाता है; इस प्रकार एक अकेला वृक्ष अपने दायरे में अत्यंत विस्तृत क्षेत्र को समा सकता है। पत्तियाँ चीमड़, पूर्ण आकार वाली, अंडाकार या दीर्घ वृत्ताकार होती हैं, इनकी लंबाई 20-40 सेमी तक होती है और इनमें उभरी हुई पार्श्व शिराएँ होती हैं। फलों का व्यास 1 से 2 सेमी तक होता है, उनमें वृंत नहीं होते, और पत्तियों के कक्षों में जोड़े के रूप में पाए जाते हैं, और पक जाने पर ये चमकीले लाल हो जाते हैं।
प्रयोग
Ficus benghalensis (चित्र: पीटर गैसन)
बरगद का प्रयोग चपड़े के उत्पादन के लिए किया जाता है, जो फ्रेंच पॉलिश का अवयव होता है। चपड़े को एक रेजिनयुक्त स्राव से प्राप्त किया जाता है जिसे लाख कहते हैं, उसे वृक्ष पर रहने वाले अनेक कीड़े उत्पादित करते हैं, उनमें व्यावसायिक दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, लाख उत्पादित करने वाला कीड़ा (Laccifer lacca)। चपड़े के कई औद्योगिक उपयोग होते हैं, और यह बालों के रोगन का एक अवयव होता है। लाख निर्मित रंजक का उपयोग त्वचा – के प्रसाधन में किया जाता है। पारंपरिक औषधियों में बरगद का कई प्रकार से उपयोग होता है। उदाहरण के तौर पर उसके रसीले दूध का उपयोग दर्द और खरोंचों के उपचार में बाह्य रूप से किया जाता है, और यह दाँतों के दर्द की दवा भी है। इसके बावजूद, वैज्ञानिकों ने इससे पौधों की जाँच-पड़ताल अभी शुरू ही की है, उदाहरण के तौर पर इससे ल्युकोसाइनाइड्स प्राप्त किए गए हैं जिनमें डायबिटीज के उपचार करने की शक्ति संभावित है।
बरगद की लकड़ी कठोर होती है और पानी में टिकाऊ होती है। हालाँकि इसे बहुत काम का नहीं माना जाता, फिर भी इसका उपयोग फर्निचरों और भवन-निर्माण के लिए किया जाता है। इसकी वायवीय जड़ों की लकड़ी अपेक्षाकृत अधिक मजबूत होती है और इनका उपयोग खंभों के तौर पर और बैलगाड़ी के जुए के रूप में किया जाता है। इसके छाल के रेशों का उपयोग कागज और रस्सियों के निर्माण के लिए किया जाता है। बरगद के फल को ताजा अवस्था में या सुखाकर खाया जा सकता है, और अकाल की अवस्था में इसकी नवजात पत्तियों और शाखाओं को भी खाया जाता है।
खेती
इस सूखा प्रतिरोधी कोमल पौधे को यूनाइटेड किंगडम में भवनों के अंदर उगाया जाता है, लेकिन उष्ण कटिबंधीय देशों में ये सड़कों के किनारे आम तौर पर पाए जाने वाले वृक्ष हैं। अच्छी तरह सुखाई गई, जैविक कंपोस्ट और Ficus benghalensis लाभों का संतुलित एन पी के (NPK) खाद के साथ नियमित खुराक के रूप में प्रयोग करें।
इसका परागण कीटों की एक इकलौती प्रजाति Eupristina masoni द्वारा किया जाता है, जो यूनाइटेड किंगडम में नहीं पायी जाती। अतः उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र के अलावा इसका जीवित रहने योग्य बीज अन्यत्र कहीं भी उत्पादित नहीं हो पाता।
प्रकाश में चोटी पर की गई अथवा इंटर-नोडल कटिंग के माध्यम से प्रसारण, उच्च ताप पर मुक्त निकासी वाली कंपोस्ट और नमीयुक्त पर्यावरण। पौधों के काटे जाने पर यह वानस्पतिक दूध स्रावित करता है। स्राव रोकने के लिए काटे गए हिस्से को कठ-कोयले के पाउडर में डालें। इसका प्रसारण 12 घंटे तक गर्म पानी में भिगोए गए बीजों के जरिए भी किया जा सकता है।
संदर्भ एवं श्रेय
Kew विज्ञान संपादक: Melanie Thomas
योगदानकर्ता: सस्टेनेबल यूजेज़ ग्रूप
कॉपी संपादन: Kew Publishing